मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

लहसुन एक चमत्कारिक औषधि


वैसे तो आप लहसुन खाने में रोजाना ही थोड़ा बहुत लेते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि ये आपको कितनी बीमारियों से बचाता है। लहसुन के इन्हीं गुणों को जानने के लिए पढि़ए ये स्टोरी।
लहसुन के तमाम गुणों को जानने के लिए हमने बात की मेदान्ता अस्पताल की वरिष्ठ डाइटीशियन शुभदा भनौत से। उनके अनुसार लहसुन में ये फायदे हैं।
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दिल को रखता है दुरूस्त
अगर आप दिल की बीमारियों से परेशान हैं तो लहसुन आपको इनसे बड़ी ही आसानी से छुटकारा दिला सकता है। इसमें खून को पतला करने का गुण पाया जाता है। ये दिल के दौरों को पड़ने से रोकता है।
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एक एंटीआॅक्सीडेंट
लहसुन में जो एलिसिन पाया जाता है वो निकोटीन के प्रभाव को कम करता है इसलिए स्मोकरस को लहसुन सुबह चबाने की राय दी जाती है।
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एंटीबैक्टिरीयल
लहसुन एक अच्छा एंटीबैक्टीरियल है। अगर आपको कोई ऐास इंफेक्शन है जो बार- बार परेशान कर रहा है तो लहुन का प्रयोग फायदेबमद होता
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खून का थक्का बनने से रोकता है
ये बात कई क्लीनिकल ट्राॅयल में सामने आ चुकी है कि अगर किसी का ब्लड प्रैसर बढ़ रहा है और उसने लहसुन से बना कोई भी सप्लीमेंट ले लिया तो उसका ब्लड प्रैसर 1-5 प्रतिशत तक कम हो सकता है। ब्लड प्रैसर में इतनी कमी ही आपको दिल के दौरे से 30-40 प्रतिशत तक निजात दिला सकती है।
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एंटीसेप्टिक
लहसुन का ये गुण तो लोग सदियों से बताते चले आये हैं। अगर कोई आदमी घायल है तो आप लहसुन की मात्रा उसके खाने में थोड़ी बढ़ा दीजिए और फिर उसका घाव बहुत जल्दी भरना शुरू हो जायेगा।
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काॅलेस्ट्रोल को कम करता है
काॅलेस्ट्रोल की समस्या से परेशान लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है।
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हाई ब्लड प्रेसर में उपयोगी
उच्च रक्त चाप में लहसुन बहुत उपयोगी माना जाता है। लहसुन में पाया जाने वाला सल्फाइड हाई ब्लड प्रैसर को कम करने में काफी मदद करता हैै। ये सल्फाइड लहसुन को पकाने के दौरान भी नष्ट नहीं होते। इसलिए आप सब्जी और दाल में झोंक लगाते वक्त भी इसका प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि इससे इसमें पाये जाने वाले सल्फाइड नष्ट नहीं होते।
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मुंहासों से बचाता लहसुन
अक्सर युवाओं को मुहासे परेशान करते रहते हैं। ये शरीर में हार्मोनल चेंज, पेट की खराबी की वजह से हो सकते हैं। मुंहासों में लहसुन बहुत ही कारगर साबित होता है।
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कफ में लहसुन लाभदायक
ठंड या बदलते मौसम में अक्सर किसी भी उम्र के लोगों को कफ और जुकाम जैसी परेशानी हो जाती हैं। ऐसे में अगर आप लहसुन का नियमित रूप से सेवन करते हैं तो आप ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं से बड़ी ही आसानी से निजात पा सकते हैं।
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कैंसर के खतरे को कम करता है
शुभदा भनौत बताती हैं कि लहसुन में जर्मेनियम तत्व पाया जाता है जो एंटी कैंसर के रूप में काम करता है। कैंसर के इलाज में भी डाॅक्टरस लहसुन की महत्वपूर्ण भूमिका बताते हैं।
प्रतिदिन लहसुन की एक कली के सेवन से शरीर को विटामिन ए, बी और सी के साथ आयोडीन, आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्निशयम जैसे कई पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं।
शुभदा बताती हैं कि अगर आप लहसुन की 2-3 की कलियों को पीसकर गर्म पानी के साथ लेते हैं तो ये आपको ओवरवेट की समस्या से छूटकारा दिलायेगा।
बच्चों की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए लहसुन को पीसकर दूध में उबालकर पीलायें।
लहसुन की कलियों को तवे पर भूनकर बच्चों को खिलाने से सांस की तकलीफ दूर होती है। ये 3-4 कलियों से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
अगर किसी विषैले कीड़े ने आप को काट लिया है तो लहसुन को पीसकर उसको लगा लें। याद रहे गर्मी में एक घंण्टे से ज्यादा समय तक इसे त्वचा पर नही लगायें।
इन्फलूएंजा में एक लहसुन का रस पानी में मिलाकर दिन में 2-3 बार पीने से फायदा होगा।
डायबिटीज के मरीजों को अगर लहसुन और त्रिफला का 20-25 ग्राम रस सुबह-सुबह प्रयोग करने से काफी हद तक राहत मिलती है।
लकवा में मांसपेशियों को पुनः सक्रिय करने में लहसुन के तेल की मालिश फायदेमंद होती है।
अगर आपको इसकी गंध अच्छी नहीं लगती तो आप दिन में गार्लिक की 1-1 गोली सुबह शाम ले सकते हैं।
गला बैठ रहा है तो गुनगुने पानी में लहसुन का रस मिलाकर गरारे करें, गला ठीक हो जायेगा।
कुछ सावधानियां
बेशक लहसुन कुदरती खूबियों से भरपूर है। लेकिन इसे उचित मात्रा में ही लेना चाहिए। लहसुन की तासीर काफी गर्म और खुश्क होती है कुछ लोगों को रास नही आती। इसलिए इसका इस्तेमाल संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए खासकर गर्मियों में।
अगर एक या दो लहसुन की लौंग का इस्तेमाल करने पर भी इसका कोई साइडइफेक्ट हो तो इसके लिए अपने डाक्टर से सलाह लें।
अगर आपको कोई बीमारी है तो लहसुन का प्रयोग डाॅक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए।
मौसम के हिसाब से लहसुन को खाने में बदलाव करें। जाड़ों में लहसुन अधिक मात्रा में खाया जा सकता है लेकिन गर्मी में इसकी मात्रा सीमित करें।

कहीं लो ब्लडप्रेशर तो नहीं


हमारी सोसायटी में हाई ब्लड प्रेशर को काफी सीरियसली लिया जाता है, लेकिन लो ब्लड प्रेशर पर लोग अक्सर ध्यान नहीं देते। जबकि सच्चाई यह है कि कई बार यह दिल के गंभीर रोग की वजह बन जाता है। अगर आपको चक्कर आ रहे या बेहोशी की समस्या है तो आपको लो ब्लड प्रेशर हो सकता है। ये किसी भी जेंडर और उम्र के लोगों में हो सकता है। लेकिन इसे हम कमजोरी या खाना न खाने की वजह से हुआ होगा मान लेते हैं। अगर आपको दिल की बीमारी है तो आप हाइपोटेंशन के शिकार आसानी से हो सकते हैं। एनीमिया और कुपोषण वाले लोग आसानी से लो ब्लड प्रेशर का शिकार हो जाते हैं। क्यों हो जाती है लो ब्लड प्रेशर की परेशानी इसी को जानने के लिए हमने बात की मूलचंद मेडीसिटी अस्पताल के कंसंलटेंट डा. ए.के. बाली से।
क्या है लो ब्लडप्रेशर
आमतौर पर इंसान का ब्लडप्रेशर दो भागों में नापा जाता है। सिस्टोलिक यानी उचच, डायस्टोलिक यानी निम्न। सिस्टोलिक प्रेशर 100-120 और डायस्टोलिक प्रेशर 60-80 एमएमएचजी की रेंज में होता है। डा. ए.के. बाली बताते हैं जब मरीज का सिस्टोलिक प्रेशर 90 एमएमएचजी से नीचे चला जाए, तो उसे लो ब्लड प्रेशर या हाइपोटेंशन कहा जाता है। लो ब्लड प्रेसर में ब्लड का सर्कुलेशन कम हो जाता है।
क्या हैं लक्षण

लो ब्लडप्रेशर के मरीजों को आमतौर पर चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना और कुछ पल के लिए बेहोशी आना प्रमुख लक्षण हैं।

ऐसे मरीज के हाथ-पैर ठंडे रहते हैं।

हर वक्त थकान महसूस करना और घबराहट होना लो बीपी के कारण हो सकते हैं।

हार्ट में मिस्ड बीट्स भी महसूस की जा सकती है।

हार्ट के डॉक्टर इस तरह के मरीजों के चेकअप में ब्लड प्रेशर में काफी डिफरेंस पाते हैं।
ऐसे मरीजों में अक्सर ब्लड प्रेशर बदलता रहता है जैसे अगर मरीज लेटा हो, बैठा हो और बाद में खड़ा हो, तो उसके ब्लड प्रेशर में काफी बदलाव आ जाता है।
क्या वजह हैं
पानी या खून की कमी, हार्ट प्रॉब्लम, सदमे, इन्फेक्शन, शरीर से ज्यादा खून बह जाना, लंग या फेफड़ों के अटैक से, हार्ट का वॉल्व खराब हो जाने के अलावा कई दवाओं से भी बीपी लो हो जाता है।
शरीर के अंदरूनी अंगों में खून का रिसाव पौष्टिक खाने की कमी व खाने-पीने में अनियमितता बरतना भी लो बीपी की वजह हो सकती हैं।
अचानक सदमा लगना, कोई भयावह दृश्य देखने या खबर सुनने से भी लो बीपी हो सकता है।
क्यों होता है ब्लड प्रेशर कम
इसके दो प्रमुख कारण हैं।
1 आर्थोस्टेटिक हाइपरटेंशन टाइप - इसमें पेशंट को खड़े होने पर चक्कर आ जाते हैं, क्योंकि उसका ब्लड प्रेशर एकदम से 20 पॉइंट से नीचे आ जाता है। यह काफी हद तक वैस्क्यूलर एवं नर्वस सिस्टम पर आधारित वैरायटी है। हालांकि ऐसा कई बार दवाओं के साइड इफेक्ट से या एलर्जी से भी हो सकता है।
2- हार्ट डिजीज की वजह से- ब्लडप्रेशर कम होना हार्ट की गंभीर बीमारी से जुड़ा हो सकता है, जिसमें हार्ट के एयॉटिर्क व माइट्रल वॉल्व की सिकुड़न स्टिनोसिस या लीकेज की बीमारी, हार्ट फेल्योर यानी लो पंपिंग कपैसिटी एवं हार्ट की स्पीड की अनियमितता, एट्रियल फिब्रिलेशन या वेंट्रीक्यूलर एब्नॉर्मल बीट्स प्रमुख हैं।
कैसे होती हैं जांच
अगर आपको लो बीपी की प्रॉब्लम है तो खासतौर पर ब्लड में हीमोग्लोबिन, प्रोटीन लेवल, इलेक्ट्रोलाइट्स, कोर्टिसोल, ग्लूकोज व थायरॉइड हार्मोन के लेवल की जांच जरूरी है। इसके अलावा ईसीजी, टिल्ट टेबल टेस्टिंग, इकोकार्डियोग्राफी, एक्सरसाइज टेस्ट व होल्टर मॉनिटरिंग इवेंट रेकॉर्डर्स एवं हार्ट की इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिकल स्टडी व एंजियोग्राफी जांच शामिल हैं।
क्या हैं इलाज
अगर आपको लो बीपी की समस्या है तो
एल्कोहल के सेवन से बचना चाहिए।
अधिक से अधिक हरी सब्जियों का सेवन करें क्योकि इनसे शरीर के सभी अवश्यक तत्वों की कमी को दूर किया जा सकता है।
आर्थोस्टेटिक हाइपोटेंशन के लिए उचित आइसोमैट्रिक एक्सरसाइज हाथ व पैरों की, इलेक्ट्रोलाइट करेक्शन, प्रोटीन व न्यूट्रीशन करेक्शन व वैस्क्यूलर टोन मेंटेनिंग एक्सरसाइज प्रमुख हैं।
हार्ट डिजीज की वजह से लो ब्लडप्रेशर के इलाज से पहले मरीज के लिए अपनी दवाओं के साइड इफेक्ट की जानकारी भी जरूरी है। हालांकि इतना तय है कि हॉर्ट की बीमारी का अच्छा इलाज ही सफलता की गारंटी है।
क्या करें जब ब्लडप्रेशर लो हो
’ तुरंत बैठ या लेट जाएं, मुट्ठियां भींचें बांधें खोलें पैर हिलायें।
’ दवाओं का साइड इफेक्ट हो, तो हॉस्पिटल ले जाना ही उचित होगा।

कोई भी हो सकता है टी बी का शिकार


राजेश राना
राहुल शर्मा एक बीमा कंम्पनी में मार्केटिंग एग्जिक्यूटिव हैं और उम्र 27 साल है। वो टयूबरकुलोसिस यानि टी. बी. का शिकार हो गये हैं। राहुल कहते है मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा कि में कैसे टी.बी. का शिकार हो गया। मुझे बस मामूली खांसी की शिकायत थी जिसके लिए मंे डाॅक्टर के पास गया। जब डाॅक्टर ने मेरे चेस्ट का एक्स-रे किया तो मुझे बताया गया कि मुझे टीबी है। राहुल कहते हैं कि मुझे आज तक कोई खतरनाक बीमारी नहीं हुई, हां मुझे बचपन में थोड़ी सी ठंड या गर्मी से जुकाम वगैरह की शिकायत जरूर हो जाती थी लेकिन ये बड़ी ही आसानी से ठीक हो जाती थी। राहुल एक युवा हैं और उन्हें कभी बहुत बड़ी बीमारी नही हुई तो फिर कैसे राहुल टीबी का शिकार हो गये। इसी को विस्तार से जनने के लिए हमने बात की गुरू तेगबहादुर अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक अनिल सारस्वत से। डा. अनिल ने बताया कि टीबी एक ऐसी बीमारी है जो किसी को भी किसी भी उम्र में हो सकती है। अगर आपकी इम्यूनिटी कमजोर है, आप एनिमिया या एडस जैसी किसी बीमारी के शिकार हैं, ऐसे में आपको टीबी होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा आप उन लोगों के संपर्क में आते हैं जो टीबी संक्रमित हैं तो भी आप टीबी से संक्रमित हो सकते हैं। टीबी को गरीब लोगों और गरीब देशों की बीमारी माना जाता है।
विश्व टीबी दिवस कि विशेष अवसर पर हम लेकर आये टीबी पर एक आपके लिए विषेश कवर स्टोरी। 26 मार्च को टीबी दिवस है और हमारे देश में अभी भी लोग टीबी के प्रति कम जागरूक हैं। लोगों को जागरूक करने के लिए और टीबी से बचाव के लिए हमने एक्सपर्ट डाॅक्टरस से बात की कि कैसे टीबी से बचा जा सकता है और कैसे टीबी लोगों को असानी से संक्रमित कर रही है। ये विस्तार से जानने के लिए पढिए राजेश राना के इस लेख में।
टीबी एक ऐसी बीमारी है जो आपको पता भी नहीं चलने देगी और आपको अपनी गिरफत में ले लेगी। इसका पता तब चलता है जब आपका वेट अचानक से कम होने लगता है या आपके कफ में खून आने लगे।

टूबरक्युलोसिस यानी टीबी, बैक्टीरिया के कारण होने वाली संक्रामक बीमारी है। इसका मतलब कि यह एक से दूसरे व्यक्ति में फैलने वाला रोग है। इसका वैज्ञानिक नाम माइकोबैक्टेरियम टयूबरक्युलोसिस है। टीबी की बीमारी ज्यादातर फेफड़े को प्रभावित करती है, लेकिन शरीर के किसी भी अंग पर इसका दुष्प्रभाव देखने को मिल सकता है।
ये एक ऐसी बीमारी है जो आपके थोड़े से केयरलेस होने पर आपको संक्रमित कर सकती है। इसी की वजह से आज टीबी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बीमारी बन गयी है। ये बीमारी रोजाना एक हजार लोगों को मौत का शिकार बना रही है।
कैसे होता है संक्रमण
टीबी ग्रसित रोगियों के कफ, छींकने, खांसने, थूकने से टीबी का बैक्टीरिया बड़ी ही आसानी से एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को संक्रमित कर देता है।
संक्रमित व्यक्ति के कपड़े छूने या फिर उससे हाथ मिलाने से टीबी नहीं फैलता।
लक्षण
टीबी होने पर फेफड़े में इंफेक्शन के अलावा शरीर में थकान महसूस करना, हर शाम को बुखार आने या बुखार जैसा महसूस होने के साथ-साथ रात में पसीना आने जैसी समस्या से दो चार होना पड़ता है।
लंग इंफेक्शन जब बहुत ज्यादा हो जाता है तो कफ, सीने में दर्द, कफ में खून आने और सांस लेने में दिक्कत होने जैसी समस्या भी आ सकती है।
अगर कफ में खून आना शुरू हो गया तो समझ लो बीमारी खतरनाक स्टेज पर पहुंच गयी है।
अचानक से वजन कम होना टीबी का बहुत बड़ा लक्षण है ऐसे में तुरंत चैकअप कराना चाहिए।

टीबी होने पर क्या होता है
जब टयूबरक्युलोसिस बैक्टीरिया सांस के जरिए फेफड़े तक पहुंचता है तो वह कई गुना बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप फेफड़ों को बुरी तरह से प्रभावित करता है। दूसरी ओर टीबी, किडनी, हड्डी, मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड जैसे शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। हालांकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता शरीर पर इसके बढ़ते प्रभाव को रोकने में मदद करती है, लेकिन जैसे-जैसे शरीर की यह रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती जाती है, टीबी के संक्रमण से बचना मुश्किल होता जाता है।
खतरा हो सकता है यदि आप
मधुमेह रोगी, कभी कैंसर के शिकार रहे हैं या फिर एचआईवी संक्रमित रहे हैं क्योंकि ये सारी बीमारी आपके इम्यून सिस्टम को कमजोर कर देते हैं।
अगर आप स्वास्थ्य सेवा कर्मचारी हैं तो आप इसके खतरे की जद में रहते हैं। क्योंकि संक्रमित मरीज से इसका बैक्टीरिया आसानी से आपके अंदर प्रवेश कर सकता है।
सक्रिय टीबी वाले लोगों के संपर्क में आने से किसी को भी टीबी का संक्रमण हो सकता है। अगर आपकी इम्यूनिटी कमजोर नही है तो आप सक्रिय टीबी का शिकार नही हो सकते।
भारत में ये बीमारी बड़े ही शांत तरीके से फैल रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की दक्षिण-पूर्व एशिया रिर्पोट में भी भारत को नंबर वन पर रखा है। इसमें बताया गया है कि भारत में महिलाएं टीबी का सबसे ज्यादा शिकार हो रही हैं।
जांच के तरीके
छाती का एक्स-रे, बलगम या बलगम के साथ आये खून की जांच और स्किन टेस्ट।
छाती के एक्स-रे से टयूबरक्युलोसिस का पता लगाया जा सकता है। क्योंकि टीबी का बैक्टीरिया फेफड़ों पर ज्यादातर अपना हमला करते है। इससे फेफड़ों में कुछ स्पोट बंन जाते हैं।
इलाज
नई दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल के सीएमओ डॉ. विनीत सोनी के अनुसार कुछ दशकों पूर्व तक इसका इलाज संभव नही था, लेकिन एंटीबायोटिक्स के जरिए आज इसका इलाज किया जाने लगा है।अलग-अलग तरह के टीबी रोगियों को अलग-अलग तरह कें इलाज की जरूरत होती है।
डॉक्टरस के अनुसार टीबी का इलाज संभव है। टीबी के समुचित इलाज के लिए निशुल्क डॉट्स केंद्र खोले हुए हैं। उन्हें समय≤ पर दवाएं दी जाती हैं और उपचार का पूरा ध्यान रखा जाता है।
टीबी के इलाज के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि दवाईयां डाॅक्टर के निर्देशानुसार ली जायें। टीबी के लिए 6-9 महिने तक दवाई खानी पड़ती है। लेकिन कुछ मरीजों में ये अवधि बढ़ाई जा सकती है।
बचपन में भी बीसीजी वैक्सीन सभी सरकारी अस्पतालों में दी जाती है। इसी वैक्सीन की वजह से इम्यून सिस्टम शरीर की रक्षा करता है। अगर उम्र की किसी स्टेज में किसी रोग या कम एनर्जी की वजह से शरीर का इम्यून सिस्टम कमजोर हो गया तो फिर ऐसे में आप सक्रिय टीबी का शिकार हो सकते हैं।
क्या हो आहार
टीबी के मरीजों को संतुलित आहार के साथ.साथ हाई प्रोटीन डाइट देना आवश्यक हो जाता है। इसके लिए उन्हें दूध, पनीर, अंडे, चिकन और मछली खाने की सलाह दी जाती है। यदि सामान्य व्यक्ति को एक ग्राम प्रोटीन डाइट लेने की सलाह दी जाती है तो टीबी के मरीजों को अपनी डाइट में 1.5 ग्राम प्रोटीन लेने की सलाह दी जाती है।
कैसे होती टीबी की बीमारी गंभीर
वर्ड हेल्थ ओर्गेनाइजेशन के लिए काम करने वाले डा. शमीम मेनन कहते है कि एमडीआर टीबी की वो कंडीशन है जिसमें कोई दवा काम नही करती। ये कंडीशन तब आती है जब टीबी लास्ट स्टेज में पहुंच जाती है। जिसके लिए अभी कोई ड्रग्स नही बनी है। ये अवस्था तब आती जब टीबी का सही तरह से इलाज नही हो पाता।
टीबी के मरीजों को इस बात का खास ख्याल रखना चाहिए कि वे बिना सही जांच.पड़ताल किए दवाएं न लें। साथ ही उन्हें इस बात का भी खास खयाल रखना चाहिए कि दवाओं की पूरी डोज खत्म कर लें और तब तक दवाएं बंद न करें जब तक कि चिकित्सक खुद इसकी सलाह न दें।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

कैसे रखें तंदरुस्ती कायम



यदि आप चाहती हैं कि आप फिट रहें ताकि आप अपने कैरियर और परिवार को अच्छी तरह कर संभाल सकें, तो इसके लिए आपको अपनी अतिरिक्त देखभाल करनी होगी। आइए जानें कुछ टिप्स जिनको अपनाकर आप सेहतमंद और चुस्त-दुरुस्त रह सकती हैं।

व्यायाम का फंडाः

सेहतमंद रहने का सबसे आसान और ब-िसजय़या उपाय है व्यायाम। आप अपनी दिनचर्या में व्यायाम को शामिल करें। इसके लिए आपको सुबह-सुबह 30 से 45 मिनट टहलना चाहिए और कुछ व्यायाम भी करने चाहिए, जिससे आपमें चुस्ती बनी रहें और आप बीमारियों से भी बची रहें।

मोटापे से रहें सजगः

फिट रहने के लिए वजन पर नियंत्रण रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि मोटापा कई बीमारियों की जड़ होता है। इसीलिए आपको चाहिए कि यदि आपका वजन ब-सजय़ा हुआ है या आप मोटी हैं, तो आप वजन कम करने के लिए नियमित अतिरिक्त व्यायाम करें, साथ ही शारीरिक सक्रियता ब-सजय़ाएं।

पानी रखें हमेशा साथः

सेहतमंद रहने के लिए जरूरी है कि आप प्रतिदिन कम से कम तीन लीटर पानी पीएं और अधिक से अधिक तरल पदार्थ जैसे जूस, सूप, नींबू पानी इत्यादि लें।

खाने का हो डाईट चार्टः

आप को सेहतमंद रहने के लिए अपना डाईट चार्ट बनाना होगा, जिसके तहत आप कम कैलोरीज और अधिक पौष्टिक भोजन को शामिल करेंगी। ऐसे में आप प्रतिदिन पूरे दिन में कम से कम 2000 कैलोरीज ले सकती हैं। डायट चार्ट में आप सुबह का नाश्ता पर्याप्त और रात का हल्का रखने का प्रयास करें।

पोषक तत्वों का रखें ख्यालः

महिलाओं को प्रोटीन, विटामिन और कैल्शियम की अधिक जरूरत होती है। ऐसे में आपको प्रतिदिन दूध पीना चाहिए। आप चाहे तो पनीर और अंडे का सेवन भी कर सकती हैं। इससे आपको प्रोटीन और कैल्शियम भरपूर मात्रा में मिलेगा।

डाईट में शामिल करें हरी सब्जियांः

महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि वे अपनी डाइट में हरी सब्जियां, सलाद, मौसमी फल और ड्राई फ्रूट्स को शामिल करें। इससे न सिर्फ वे सेहतमंद रह सकती हैं, बल्कि उनकी कार्यक्षमता भी ब-सजय़ेगी और रोग उनसे दूर रहेंगे।

जंकफूड से करें तौबाः

फिट रहने के लिए आपको चटपटे और मसालेदार खाने को छोड़ना चाहिए। इसके साथ ही आपको जंकफूड और बाहर के खाने को भी भूलना होगा, तभी आप फिट रह पाएंगी।

अपने लिए समय निकालें

जब खुद के लिए समय नही होता तो ऐसे में आप तनाव में आ सकती हैं। इसके लिए सबसे अच्छा है आप अपने ऐसे शौक को पूरा करें जिससे आपको शांति मिलती हो। यदि आप संगीत सुनने, डांस करने, कोई गेम खेलने इत्यादि का शौक रखती हैं, तो उसे पूरा करें। इससे आप पाएंगी कि तनाव खुद-ब- खुद आपसे दूर हो रहा है।

खुद को एक्टिव रखेंः

स्वस्थ रहने के लिए आपको शारीरिक रूप से सक्रिय रहना जरूरी हैं। इसके साथ ही यदि आपको बेड टी की आदत है तो इसे भी आपको बदलना होगा। दूध वाली चाय के बजाय, ग्रीन टी, लेमन टी इत्यादि लेना चाहिए।

ये बात सही है कि आज जीने के लिए अतिरक्ति प्रयास करने की जरूरत होती है और जरूरत ने आप सबको इतना व्यस्त बना दिया है। लेकिन ऐसे में अगर आप स्टोरी में बतायी गई कुछ चीजों को अपना लेगीं तो वाकई आप काफी हद तक अपने आपको और आपने परिवार को स्वस्थ्य रख पायेंगी।

मंगलवार, 20 मार्च 2012

फ़ूड जो बदल दे मूड



क्या आपने कभी सोचा है कि जरा-सी बहस पर आपको गुस्सा
क्यों आ जाता है? क्यों कुछ लोग अपना गुस्सा कंट्रोल नहीं कर
पाते हैं? जबकि आपने तमाम ऐसे लोग भी देखे होंगे, जो लोगों
के लाख भला-बुरा कहने के बावजूद बिल्कुल शांत रहते हैं और
उन्हें गुस्सा भी नहीं आता। अगर चाइनीज माइक्रोबायोटिक
डाइट की फिलॉसफी मानें, तो हम जो भी खाते हैं, वह हमारे
मूड, इमोशन और फिलिंग को प्रभावित करता है। इतना ही
नहीं, आप अपनी डाइट से यह जान सकते हैं कि आप किस तरह के व्यक्ति हैं।

इमोशंस पर फूड इफेक्ट

भले ही तनावपूर्ण स्थिति आपके कंट्रोल में ना हो, लेकिन आप
कुछ चीजों को ध्यान में रखकर इसे कंट्रोल कर सकते हैं। मान
लीजिए, आप गुस्सैल किस्म के इंसान हैं। ऐसे में हमारे लिए
समझने वाली बात यह है कि माइक्रोबायोटिक डाइट के मुताबिक
लीवर और गुस्से का सीधा संबंध है। अगर आप अपनी डाइट में
लाल मीट, मक्खन और प्रोसेस्ड फूड लेते हैं, तो इससे लीवर ठीक
से काम नहीं कर पाता है। लीवर के ठीक से काम ना करने से आपको
स्ट्रेस व चिड़चिड़ापन की शिकायत होने लगती है। इससे आपके अंदर
नेगेटिव इमोशंस आते हैं।

अगर आप बहुत ज्यादा स्ट्रेस में हैं, तो इसका असर पेंक्रियाज और
स्प्लीन पर पड़ता है। स्ट्रेस को दूर करने के लिए आप अल्कोहल, कॉफी
व चाय ज्यादा लेने लगते हैं। इसके चलते आपकी बॉडी में इंसुलिन का
लेवल कम हो जाता है, जो आपकी हेल्थ के लिए ठीक नहीं होता। जाहिर
है, आपको ऐसा कुछ नहीं खाना या पीना चाहिए, जो इंसुलिन को कम
करने वाला हो। आप अपनी डाइट में फल व सब्जियां शामिल करें। इससे
आपकी बॉडी में इंसुलिन का लेवल सामान्य रहेगा। यह सही है कि आप
एक दिन में अपनी सेहत दुरुस्त नहीं कर सकते, लेकिन इसमें कोई दो
राय नहीं कि अगर आप अपना डाइट पैटर्न चेंज करते हैं, तो इसका
पॉजिटिव असर आपको जल्द दिखेगा।