मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

धुंधलाती नजर - कैटरैक्ट



बढती उम्र के साथ आप बहुत सी स्वास्थ्य समस्याओं का शिकार होते चले जाते है। कैटरैक्ट बुजुर्गों की आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। आइये इसके बारें में चर्चा करते है, इस लेख में :-
हम सभी की आँखों में एक प्राकृतिक लेंस होता है। जब यह लेंस धुंधला पड़ने लगता है तब दिखाई देना कम हो जाता है। इसी लेंस के धुंधले पड़ने को ही कैटरैक्ट या आम बोलचाल की भाषा में मोतियाबिंद कहते है।
डॉ कीर्ति कुमार अयाचित, सीनियर कन्सलटेंट, सेंटर फॉर साईट, गुडगाँव के अनुसार, सामान्यतौर पर यह समस्या उम्र के बढ़ने पर होती है। मगर कई बार इस समस्या का कारण उम्र के बढ़ने के साथ किसी प्रकार का ट्रोमा या फिर मैटाबोलिक डिसआर्डर जैसे डायबटीज, हायपोथायरोइड या आँखों में सूजन का आना भी हो सकता है।

क्या है इसके लक्षण : -
  • धुंधला दिखाई देना
  • रंग का फीका, हल्का या साफ़ दिखाई न देना
  • तेज रोशनी या सूरज की रोशनी के प्रति सैंसटिविटी
  • रात में कम दिखाई देना
  • रात के समय देखने में कठिनाई होना, आदि।
चंद सवाल कैटरैक्ट के : -
कैटरैक्ट यानि मोतियाबिंद को लेकर मन में बहुत से सवाल उठते है। आइये उन सवालों का हल डॉ कीर्ति से जानते है :-

इसका निर्माण कैसे होता है ?
कैटरैक्ट की समस्या बुजुर्गों में या बढती उम्र में देखने को मिलती है। जैसे जैसे उम्र बढती चली जाती है प्रोटीन जोकि मानव क्रिस्टल लाइन में होता है, उसमें कई प्रकार के कैमिकल बदलाव आने लगते है। इन्हीं बदलावों के कारण यह लेंस अपारदर्शी होता चला जाता है जोकि कैटरैक्ट का निर्माण करता है।

क्या चश्मे का नम्बर बदलकर कैटरैक्ट से निपटा जा सकता है?
सबसे आम सवाल जो ज्यादातर इस समस्या से ग्रस्त रोगी के मन में आता है। कैटरैक्ट की समस्या में धुंधला इसलिए दिखाई देता है क्योंकि कैटरैक्ट में रोशनी आँखों के भीतर नहीं जा पाती है। यहीं कारण है कि रोशनी रैटिना तक नहीं पहुँच पाती है जिस कर्ण व्यक्ति को धुंधला दिखाई देता है। इसलिए यदि आप सोच रहे है कि आप केवल चश्मे का नम्बर बदलकर ही कैटरैक्ट के धुंधलेपन से निपट सकते है तो आप गलत सोच रहें है। कैटरैक्ट से निपटने के लिए ऑपरेशन करना जरुरी है।
क्या कैटरैक्ट और ब्लड प्रैशर के बीच कोई सम्बन्ध
है? जी हाँ कैटरैक्ट और ब्लड प्रैशर के बीच बहुत गहरा सम्बन्ध है। यदि ऑपरेशन के पहले या दौरान रोगी का ब्लड प्रैशर अधिक हो तो ऑपरेशन कर पाना संभव नहीं होता है। इसलिए ब्लड प्रैशर का नियंत्रित रहना कैटरैक्ट की समस्या में बहुत जरुरी है।

क्या सर्जरी के बाद किसी प्रकार की सावधानी बरतनी जरुरी है?
जी हाँ, ऑपरेशन के बाद रोगी को सावधानी बरतनी चाहिए। कुछ महत्वपूर्ण बातें जिन्हें रोगी को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए, वह है : -
  • डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाइयों का प्रयोग चार से छह सप्ताह तक करें।
  • अपने शुगर और ब्लड प्रैशर को भी नियंत्रित रखने का प्रयास करें।
  • सिर धोते समय विशेष सावधानी बरतें
  • अगर आप घर से बाहर जा रहे है तो गहरे रंग के सन ग्लासिस पहनकर ही जाएँ।
  • पौष्टिक भोजन का सेवन करें।
उपचार :-
कैटरैक्ट के उपचार की कई नयी तकनीकें अब उपलब्ध है। अगर आप फैकोमुलसुफिकेशन को मल्टीफ़ोकल आईओएल के साथ किया जाता है तब कैटरैक्ट सर्जरी के बाद चश्मा पहनने की कोई जरुरत नहीं होती है। मगर यदि आप इसे मोनोफोकल आईओएल के साथ करते है तब पढने के लिए चश्में का प्रयोग करना जरुरी होता है।

एक अन्य नई तकनीक है जिसमें फैकोमुलसुफिकेशन को फोल्डेबल आईओएल के साथ किया जाता है। इस तकनीक का प्रयोग कई आई सेंटर में अब किया जाने लगा है।

इन सब नई तकनीकों के अलावा कुछ पुरानी तकनीकें जैसे एसआईसीएस, इसीसीइ का प्रयोग आज भी कई जगहों पर किया जाता है।

कैटरैक्ट यानी मोतियाबिंद से मुक्ति पाने के लिए कई सरकारी, एनजीओ और प्राइवेट सेंटर है। अलग अलग जगहों पर इसकी कीमत भी अलग अलग है। इसकी कीमत नि:शुल्क से होकर साठ हजार तक हो सकती है।

यदि आपके घर में कोई बुजुर्ग है और जिन्हें दिखने में कठिनाई हो रही हो तो तुरंत जाकर उनकी आँखों की जाँच अवश्य कराएँ।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

अपना ख्याल रखना


कहते है न अगर शरीर स्वस्थ हो तो जीवन में खुशियाँ भी आती है और सम्पन्नता भी। पर इतनी बिजी जीवनशैली में किसी के पास टाइम कहाँ है की वह आराम से बैठ कर इस बात पर विचार करें कि वह अपने शरीर को स्वस्थ रखने की कसौटी पर कितना खरा उतर रहा है? पर सच्चाई यह है कि आपका स्वास्थ्य आपके हाथ में, अब आप चाहे तो आप अपने शरीर को स्वस्थ रखे या फिर अनजान बनकर अपने शरीर को बीमार करते रहें।

आईये कैसे आप अपनी केयर करें इस बात पर चर्चा करते हैं : -


आई केयर :-

आँखों से हम बहुत प्यार करते है। फिर भी उनका ध्यान रखना हम जरुरी नहीं समझते है। युवाओं में यह बहुत प्रचलित रिवाज है जिसमें सुंदर दिखने के चक्कर में वे चश्मा पहनने से बचते फिरते है। कई बार तो यह पता होने पर भी की आँखे कमजोर है हम अपनी आँखों की जाँच इस डर से नहीं करते है कि कहीं डॉक्टर चश्मा पहनने की सलाह दें। जबकि वास्तविकता यह है कि चश्मा पहनना बहुत जरुरी है।


यह तो रहीं आँखों के प्रति लापरवाही की सामान्य बात, गम्भीर बात यह है कि डायब्टीज या हायपरटेंशन का शिकार रोगी भी अपनी आँखों के प्रति लापरवाही का रवैया अपनाते है। डायब्टिक और हाई ब्लड प्रेशर के रोगी को आँखों के प्रति सामान्य व्यक्ति की तुलना में ज्यादा सतर्क रहना चाहिए। इस समस्या से ग्रस्त रोगी का आँखें कमजोर होना या मोतिया बिन्द की समस्या बहुत ही सामान्य होती है। अगर आप या आपके अभिभावक में से किसी को डायब्टीज या हायपरटेंशन है तो मोतियाबिंद की जांच कराएँ


क्या करें :-

डॉ मनोज राय मेहता, सीनियर कसलटेंट, औपथमोलोजी, मूलचंद आई क्लिनिक, मूलचंद मेडसिटी के अनुसार,


  • यदि आपकी आँखें कमजोर हो तो चश्मा अवश्य पहने।

  • साल में एक बार आँखों का टेस्ट अवश्य कराएँ। आँखों के कमजोर होने तक का इन्तजार बिलकुल न करें। बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी आई ड्रॉप का प्रयोग न करें। यदि आप ऐसा करते है तो आपको परिणाम के रूप में एलर्जी का सामना करना सकता है।

  • डायब्टिक रोगी को अपनी आँखों का टेस्ट नियमित रूप कराते रहें। अपने ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर के स्तर को नियंत्रित रखे और लेजर फोटोकोगुलशन को डॉक्टर के निर्देशानुसार करें।

  • कंप्यूटर पर काम करने वाले थोड़े थोड़े समय में ब्रेक लेते रहें। इससे आँखों को आराम मिलता है।

हार्ट केयर -
ह्रदय यानि शरीर का पावर हाउस कि महत्ता हमें इसके बीमार होने पर ही पता चलती है। कई बार तो लोगों को यह पता नहीं चल पता है कि उन्हें हृदय सम्बन्धी कोई परेशानी भी है। हाई ब्लड प्रैशर की समस्या अब कम उम्र में भी होने लगी है। कम उम्र से ही धूम्रपान, एल्कोहल का सेवन, वजन ज्यादा होना और वंशानुगत रूप में यह समस्या जन्म ले रही है। कई बार पता चलने पर भी हम सभी डॉक्टर द्वारा दी गयी दवाइयों और बताये गये परहेज का पालन नहीं करना चाहते है क्यूंकि हमें लगता है कि हम एक दम फिट है। जोकि हृदय सम्बन्धी समस्या के परिणाम के रूप में हमारे सामने जल्द ही आ जाता है।


क्या करें -


पारस अस्पताल की कन्सल्टेंट कार्डियोलोजिस्ट डॉ हंसा गुप्ता के अनुसार -



  • अपनी दवाइयों का नियमित रूप से सेवन करें।

  • अपने ब्लड प्रैशर व कोलेस्ट्रोल पर नजर रखें।

  • वजन कम करें। शारीरिक रूप से एक्टिव रहें।

  • पौष्टिक भोजन का सेवन करें।

  • नियमित चैकअप कराएँ जिसमें टीएमटी, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रोल आदि शामिल है।

  • धूम्रपान और एल्कोहल का सेवन करने से बचें।

  • तनाव से बचने का प्रयास करें।

बोन केयर -
हमारे देश में कितनी ही महिलाओं को इस बात का पता ही नहीं चलता है कि वे ओस्टियोपोरोसिस की समस्या का शिकार है। विटामिन डी की कमी और प्रचुर मात्रा में कैल्शियम का सेवन न करने कारण अक्सर भारतीय महिलाओं की हड्डियाँ मजबूती खोने लगती है। मीनोपोज के बाद हो रहे शारीरिक बदलाव भी स्थिति को गंभीर बना देते है।


क्या करें -
अपोलो अस्पताल के कन्सल्टेंट एंडोक्रिनोलोजिस्ट डॉ अम्बरीश मिथल के अनुसार,



  • अपने भोजन में कैल्शियम व प्रोटीन की मात्रा को बढाये।

  • मीनोपोज के बाद सभी महिलाओ को अपना बोन डेंसिटी टेस्ट अवश्य कराना चाहिए। यह टेस्ट आपकी हड्डियों को स्थिति का सही चित्र पेश करती है।

  • व्यायाम करें ताकि आपकी हड्डियाँ मजबूत बने।

सेक्सचुअल हैल्थ केयर -
इतना ज्यादा ज्ञान और जागरूकता के बाद भी हम अक्सर अपने गुप्त अंगों के स्वास्थ्य समस्याओं पर चर्चा करते हुए घबराते है। कई बार अज्ञानता तो कभी समस्या का दूसरों के सामने खुलने के दर से हम अपनी समस्याओं को दबा जाते है, जिसके परिणामस्वरुप हमें बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
अक्सर महिलाओं सेक्सचुअल ट्रांसमिटिड डिजीज, सर्विक्स कैंसर, यूटीआई आदि कुछ ऐसी समस्याएँ है जिनके बारें में वे चर्चा करते हुए घबराती है। पुरुषों के साथ भी ऐसा ही होता है।


क्या करें -
डॉ गीता चड्ढा, सीनियर कन्सल्टेंट गायनोकोलोजिस्ट, इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के अनुसार -



  • नियमित जाँच कराएँ।

  • महिलाओं की सवास्थ्य जाँच में सबसे पहले पेल्विक जाँच को स्थान दिया जाता है। यह प्रौढावस्था की महिलाओं के स्वास्थ्य सम्बन्धी पूर्व सूचना देने में सहायक होता है। आंकड़े यह साफ़ बताते है कि हमारे यहाँ ज्यादातर महिलाये सेक्सचुअल ट्रांसमिटिड डिजीज की गंभीरता को नहीं जानती है। लेकिन पेल्विक जांच की मदद से कुछ कैंसर की जानकारी शुरुआत अवस्था में, प्रजनन अंगो की समस्याए या मासिक धर्म के दौरान होने वाली असहनीय दर्द की समस्या के कारणों का पता लगाया जा सकता है।

  • महिलाएं तो फिर भी अपनी समस्याओं पर खुलकर चर्चा कर पाती है मगर कई बार पुरुष अपनी समस्याओं पर सीधे बताने की बजाय घुमा फिरा कर ही चर्चा करते है। यदि आपको भी कोई समस्या परेशान कर रही है तो ओन्कोलोजिस्ट के पास अवश्य जाएँ।

मूलभूत बातें :-



  • साल में जिस तरह आप साल में एक निर्धारित तारीख को अपना जन्मदिन मनाते है, ठीक उसी तरह साल का कोई भी दिन या महीने का निर्धारण कर ले जिस दिन आप अपना पूरा मेडिकल चैकअप करायेंगे।

  • धूम्रपान और एल्कोहल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते है। इस सच को अपनाएं और इन्हें अपने जीवन से बाहर करें।

  • तनाव से बचने का प्रयास करें।

अपने शरीर की सुने। यदि आपका शरीर आपको लक्षणों के माध्यम से यह बता रहा है कि वह बीमार ही तो अपने शरीर की सुने।

रविवार, 28 मार्च 2010

धीरे से आना अखियन में

जिस तरह से हम सभी के लिए खाना जरुरी है, ठीक उसी तरह हमारे लिए नींद भी जरुरी है। अक्सर हम नींद को अपनी दिनचर्या का एक सामान्य हिस्सा मानकर उसकी महत्ता को अनदेखा कर देते है। लेकिन क्या आप जानते है कि आपके शरीर के बढ़ते वजन, दिनभर लगने वाली थकान, आँखों के नीचे बढ़ते काले घेरे, पीठ में दर्द, हाथ-पैरों में आई सूजन का कारण कुछ और नहीं बल्कि नींद पूरी न होना है। कैसे बेहतर नींद पायें, आईये इस विषय के जानकारी पाने के लिए इस लेख को पढ़ते है।

नींद पूरी न हो तो आप दिनभर अपने आपको थका-थका और चिढचिढ़ा महसूस करते है। अधिकतर समय की कमी हमारी नींद को पूरा होने से रोकते है, मगर कई बार आपकी दिनचर्या भी आपकी नींद को प्रभावित कर सकती है। डॉ संजय मनचंदा, सीनियर कंसलटेंट, स्लीप मेडिसन, सर गंगा राम अस्पताल के अनुसार, याददाश्त के मजबूत होने का कार्य गहरी नींद में होता है। नींद में शरीर आराम करता है ताकि वह अगले दिन के लिए कार्य कर सकें। नींद में केवल कुछ हे आधारभूत फंक्शन एक्टिव रहते है और बाकी सभी प्रक्रियाएं रिचार्ज मोड़ की तरफ चली जाती है।

आइये कुछ महत्वपूर्ण बातों पर नजर डालते है : -

  • अपने सोने के घंटों के साथ खिलवाड़ करना बंद करें। हर रोज कम से कम छह से सात घंटे नींद अवश्य ले। डॉ मनचंदा ने सुझाव देते हुए बताया है कि "आप पूरे सप्ताह तक अपनी सामान्य दिनचर्या में निर्धारित किये गए सोने के समय को बनायें रखे। बार-बार सोने से समय में बदलाव करने से शरीर के भीतर की बायोलोजिकल घड़ी में गड़बड़ी हो सकती है जो नींद सम्बन्धी समस्याओं को जन्म देती है।" उन्होंने यह भी कहा है कि " यदि आप पार्टी एनिमल है तो पार्टी को कम करें और नींद पूरी करने को पूरा समय दें। ये आपके शरीर व मस्तिष्क दोनों के लिए अच्छा विचार होगा। साथ ही वीकेंड में भी अपने निर्धारित समय पर उठने का प्रयास करें।
  • यदि आप ऐसे कार्य क्षेत्र जैसे - कॉल सेंटर आदि से जुड़े है तो आपकी दिनचर्या सामान्य व्यक्ति से एकदम उलट होती है। इसलिए आप कुछ बातों का विशेष ध्यान रखे। दिन के समय सोते हुए कमरे में अँधेरा कर सोये। और यदि संभव हो तो ऐसे कमरे में सोये जहाँ एकांत हो और जहाँ घर में सबसे कम गतिविधियाँ होती हो। इससे आपको रात का अहसास होगा और आपका शरीर गहरी नींद सोया पायेगा।
  • रात के समय काम करने वाले लोगों के विषय में चर्चा करते हुए डॉ अनिल अरोरा, गेसटरोअन्तरोलोजिस्ट, सर गंगाराम अस्पताल ने बताया है कि मैंने देखा है कि आजकल युवा वर्ग अक्सर हार्ट बर्न और पाचन सम्बन्धी समस्याओं की शिकायत लेकर आते है। इन् लोगों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा बीपीओ क्षेत्र से जुड़ा हुआ था जोकि अपनी बायोलोजिकल घड़ी के विपरीत जाकर कार्य करते है। गलत समय पर खाना और बहुत हाई कैलरी वाले स्नेक्स - पिज्जा, बर्गर, कैंडी, चोकलेट, आदि का सेवन करने से पाचन तंत्र को क्षति पहुचती है। इन सभी को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर अरोरा ने कुछ सुझाव दिए है : -

(क) घर में बना खाना खाएं। खाना बनाते समय मसालों व तेल का कम मात्र में प्रयोग करें। एक बात का विशेष ध्यान रखें कि आप ऑफिस जाने से पहले अपने घर में भोजन अवश्य करें। घर का बना पोष्टिक भोजन आपको भूखा रहने से बचाएगा। साथ ही यह आपको कार्यस्थल पर जंक फ़ूड खाने से भी बचाएगा क्योंकि आपका पेट भरा हुआ होगा तो आप भोजन का सेवन चाहकर भी नहीं करेंगे।

(ख) अपने शरीर की नमी को बनायें रखने के लिए पानी पर निर्भर रहे।

(ग) अगर आपको स्नेक्स अपनी तरफ खींचते है तो आप अपने डेस्क पर पोष्टिक स्नेक्स रखे। नट्स, भुने चने, मुरमुरे, घर का बना पोष्टिक सेंडविच या कोई हेल्दी स्नेक अपने पास रखे।

  • अपने बेडरूम में टीवी बिलकुल न लगायें। अक्सर हम देर रात तक टीवी देखते रहते है। यदि टीवी आपके रूम में नहीं होगा तो आप देर रात तक टीवी देखकर अपनी नींद को परेशान नहीं करेंगे।
  • रात में सोने से पहले कैफीन या एल्कोहल का सेवन न करें। कहने का तात्पर्य है कि किसी भी प्रकार का पेय या खाद्य पदार्थ जिसका सेवन करने के बाद नींद उड़े ऐसे पदार्थों का सेवन करने से बचे।
  • व्यायाम हर समस्या में मदद करता है। डॉ जितेन्द्र नागपाल, मनोवैज्ञानिक, मूलचंद मेडिसिटी के अनुसार, योग और ध्यान न केवल आपको तनाव को दूर करता है। अगर आप तनाव ग्रस्त नहीं होंगे तो आप अच्छी नींद ले पाने में सफल रहेंगे। मगर योग और ध्यान या किसी भी प्रकार का व्यायाम हमेशा भोजन को खाने के बाद कम से कम दो से तीन घंटे के बाद ही करें।
  • मोबाइल फोन सबसे ज्यादा आपकी नींद में खलल डालती है। इसलिए रात में सोते समय अपने मोबाइल फोन को या तो स्विच ओफ कर दे या फिर आप मोबाइल का साइलेंट मोड़ में पर रखे।

नींद हम सभी के लिए जरुरी है। आप चाहे कितना भी पोष्टिक भोजन का सेवन करें। आप तब तक स्वस्थ नहीं रह पायेंगे जब तक आप नींद पूरी न कर ले।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

स्पिरुलिना - दि सुपर फ़ूड

प्रकृति ने हमें देन के रूप में बहुत सी जड़ी-बूटियां दी है। आयुर्वेद में इन्हीं जड़ी बूटियों का प्रयोग कर स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को दूर किया जाता है। आज हम इन् जड़ी बूटियों यानी हर्ब की दुनिया में से एक हर्ब स्पिरुलिना के बारें में चर्चा करते है।

दि सुपर फ़ूड, जी हाँ स्पिरुलिना को इस नाम से जाना जाता है। एक कम्पलीट फ़ूड सोर्स होने के कारन हो इससे इस उपाधि से नवाजा गया है। स्पिरुलिना, एक बेहतरीन डायट्री सप्लीमेंट है, जिसे आप टेबलेट और पाउडर के रूप में आसानी से बाजार से प्राप्त कर सकते है। स्पिरुलिना विटमिन ऐ का बेहतरीन स्रोत है और इसमें प्रोटीन भी प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा मीट में मिलने वाली मात्रा से लगभग पांच गुना अधिक होती है। इन सबके अलावा इसमें मिनरल्स की भी कोई कमी नहीं है। इसमें पोटेशियम, कैल्शियम, सिलेनियम, जिंक आदि प्रचुर मात्रा में होते है। विटमिन श्रेणी की बात करें तो आप इसका सेवन कर विटमिन बी१, बी२, बी३, बी६ की खूबियाँ पा सकते है।

स्पिरुलिना में जरुरी फैटी एसिड जैसे गामा लिनोलेनिक एसिड जीएलऐ, एल्फा लिनोलेनिक एसिड एएलए, लिनोलेनिक एसिड भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते है।

स्पिरुलिना का सेवन करने से -
  • स्ट्रोक की गंभीरता में कमी आती है।
  • किमो थेरपी के कारण होने वाले हृदय को नुकसान से बचाता है।
  • बढती उम्र में मैमोरी लोस नहीं होता है।
  • हे फीवर से बचाव हो सकता है।
  • वजन बढ़ने में मदद मिलती है।
  • एनीमिया को दूर करने में मदद मिलती है।
  • कोलेस्ट्रोल और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।

इसका सेवन करने से बचे, यदि -

  • आप हायपर पैरा थायरोडिजम के रोगी है।
  • आपको सी फ़ूड या सी वीड से गंभीर एलर्जी हो।
  • बहुत तेज बुखार हो।

साइड इफेक्ट -

सामान्यतोर पर इस हर्ब का सेवन करने पर कोई साइड इफेक्ट देखने को नही मिलता है। मगर कुछ लोग को इसका सेवन करने पर हल्का बुखार महसूस हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्यूँकी शरीर को प्रोटीन को बर्न करने के लिए अतिरिक्त एनर्जी की जरुरत होती है। इसके अलावा थोडा चक्कर आना, उलटी आना, प्यास लगना, कब्ज की समस्या होना, स्किन पर रैशेज पड़ना और पेट में दर्द होने जैसे कुछ लक्षण भी देखने को मिल सकते है।

ध्यान दे -

  • स्पिरुलिना एक सुरक्षित हर्ब है। मगर बिना डॉक्टर की सलाह लिए इसका सेवन करना समस्या को निमत्रण देने जैसा होगा। इसलिए हमेसा डॉक्टर द्वारा बताई गयी डोज का ही सेवन करें। ओवर डोज के कारन शरीर में हाई प्रोटीन के कारन यूरिक एसिड बढ़ सकता है और लीवर को नुकसान पंहुचा सकता है।
  • एक बात का विशेष ध्यान रखे कि इसका सेवन करने पर आपको सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा पानी पीना चाहिए। ज्यादा यानी करीब आधा लिटर ज्यादा पानी अवश्य पिए।
  • इसका काफी, चाय, जूस और साफ्ट ड्रिंक के साथ सेवन न करें। इसका सेवन करने से शरीर के एंजाइम और स्पिरुलिना के पोषक तत्व नष्ट हो सकते है।

(डॉ दीप्ति धरा, तुलसी होलिस्टिक क्लिनिक, आयुर्वेद आचार्य के साक्षात्कार पर आधारित)

रविवार, 21 मार्च 2010

गुणकारी त्रिफला


आयुर्वेद में त्रिफला के बारें में बहुत कुछ लिखा गया है और इसका प्रयोग भी बहुत किया जाता रहा है। त्रिफला, तीन फलों का एक अद्वितीय मेल है। त्रिफला का अर्थ है तीन फल। इसमें हरद, बहेड़ा, आंवला तीन बराबर हिस्सों में होता है। यहीं कारन है की इसे त्रिदोषिक रसायन भी कहा जाता है।



हरद - यह ह्रदय, दिमाग के लिए टोनिक की तरह कार्य करता है और वात दोष को संतुलित करता है।

बहेड़ा - यह लीवर और ह्रदय सम्बन्धी समस्याओं को कम करता है और साथ ही यह दृष्टी और बालों के विकास में मदद करता है। यह कफ को संतुलित करता है।

आंवला - आंवला एक बेहतरीन एंटी ओक्सिडेंट की तरह कार्य करता है। यह शरीर के भीतर रोग प्रतिरक्षात्मक क्षमता को भी बूस्ट करता है। इसके अलावा यह पित्त को संतुलित करता है।



त्रिफला की सबसे बड़ी विशेषता यह है की यह वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को नियंत्रित करने में मदद करता है। यदि शारीर के भीतर सभी दोषों को नियंत्रित किया जाता है तब शारीर को स्वस्थ रखा जा सकता है। त्रिफला आपको स्वस्थ रहने में मदद करता है।



अनमोल विशेषताएं : -



त्रिफला एक शक्तिशाली रसायन है जो शरीर की भीतर से क्लींजिंग और डिटाक्स करने में मदद करता है। अध्ययनों से यह साबित हो गया है कि त्रिफला एंटी केन्सरिओजेनिक क्षमता युक्त होता है। इसमें बयोफ्लेवानोयड, जरुरी अमीनो एसिड और विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होता है। आईये इसकी विशेषताओं के बारें में जानते है -




  • आंवला इसमें एंटी ओक्सिडेंट कि विशेषता को बढाता है। एंटी ओक्सिडेंट रोग प्रतिरक्षात्मक क्षमता को बढाने में मदद करता है और शरीर को रोगों से ग्रस्त होने से बचाता है।


  • त्रिफला, ब्लड प्यूरीफायर की तरह काम करता है। ब्लड प्यूरीफायर की तरह काम करने के कारण यह ब्लड सम्बन्धी समस्याओं और स्किन सम्बन्धी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है।


  • पाचन को दुरुस्त करने में मदद करता है और अपच, पेट दर्द, कब्ज़ की समस्या को दूर करता है और भूख को भी बढाता है।


  • अगर आप एनीमिया का शिकार है तो त्रिफला आपकी मदद कर सकता है। त्रिफला शरीर में हिमोग्लोबिन बढाता है।


  • यह स्किन टोन या रंगत को सुधारता है। साथ ही देखने की क्षमता और बालों के विकास को भी बढाता है।


सचेत रहें : -



मोसम के अनुसार आयुर्वेद में अलग अलग दवाइयों के साथ त्रिफला को मिलकर दिया जाता है ताकि इसका बेहतर परिणाम निकल सकें। त्रिफला बेहतरीन हर्ब है जिसका सेवन आप केप्सूल, पाउडर और टेबलेट के रूप में कर सकते है। मगर इसका सेवन करने से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखना जरुरी है।





  • त्रिफला का प्रयोग किसी भी उम्र के व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है मगर गर्भवती स्त्री को इसका सेवन करने से बचाना चाहिए। गर्भवती महिला द्वारा इसका सेवन करने पर गर्भपात की आशंकाएं बढ़ सकती है।


  • त्रिफला पूरी तरह से सुरक्षित है फिर भी किसी प्रशिक्षित आयुर्वेद प्रेक्टिशनर से इसका सेवन करने से पहले इसकी डोज़ के बारें में परामर्श अवश्य ले ले।


(डॉ प्रीति छाबरा, कंसल्टेंट, आयुर्वेद फिजिशियन, सर गंगा राम अस्पताल के साक्षात्कार पर आधारित)